बड़ा भयंकर सपना देखा, जैसे रूह से जान निकल गयी।
दानवता ने गढ जीते है, मानवता कोने में सो गयी ॥
रिश्ते नाते भूल गए सब, नसीहतें अपमान सी हो गयी।
मेरी दोनो आँखे भी अब, आपस में अनजान सी हो गयी॥
भूल गए आँगन चौबारे, दूर से दीखते पिंजरे सारे।
जो धन्ना सेठ की कोठी थी, वो धन्ने के मकान सी हो गयी॥
हम जीते जागते डैड हो गए, कुछ दादा-दादी मैड हो गए।
जिंदगी ने पढ ी किताबे तो कितनी नादान सी हो गयी॥
अब राम रहीम में दूरी हो गयी, प्यार जहां था छूरी हो गयी।
कल जो सिंवैया ईद की थी, वो अब अब माह-ए-रमजान सी हो गयी॥
बे-ईमानी कहलाती थी, जो कल तक इस दुनियां में।
आज यहाँ पूजी जाती है, कितनों के ईमान सी हो गयी॥
शान रही थी रूप को ढ कना, कल तक की मर्यादा में।
अब तो शान उसी की है, जो लाख दिलों में जान सी हो गयी॥
जो माथे तिलक लगाते थे, नीयम से सर मुंडवाते थे।
अब जींस पहनते पंडित जी, टोपी चश्मा पहचान सी हो गयी॥
कृष्ण सुदामा के रिश्ते, कैसे उनसे नीभ जाते थे।
अब धन वालो से यारी रखना, कैसे अब वरदान सी हो गयी॥
नए नवेले सपनें है, यहाँ बेगाने से अपने है।
स्वप्न-लोक में भीड भरी है, सच्चाई सुनसान सी हो गयी॥
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