मंगलवार, मार्च 01, 2011

कुछ तो बात निराली थी


स्वार्थ भाव सोचे बिना, वो लड़ते रहे जूनून से ।
अपने हवाले कर गये बगिया, जो सींची अपने खून से ॥
राजगुरू सुखदेव भगतसिंह, इन सबका घर परिवार था ।
हम मिट जाये वतन ना मिटे, उनका मगर विचार था ॥
प्रेम प्यार परिवार में रहना उनका भी अधिकार था ।
प्राण को खोकर भी सुख पाना, लेकिन सच्चा सार था ॥
मान देश का बड ा है, अपनी जान की कीमत सस्ती है ।
हर दानी छोटा लगता है, ऐसी उनकी हस्ती है ॥
भूख से कितने दिन लड कर, भी कभी नही मजबूर हुऐ ।
तब आतंकी भी कहलाए, जो देश के कोहिनूर हुए ॥
जाते जाते वन्दे मातरम्‌, का जिसने जयघोष किया ।
ब्रिटिश फौज को बिन हथियारों, के मानो बेहोश किया ॥
आज फिजाओं में गूंजा दो, जो उनका सन्देश है ।
अन्यायी और भ्रष्टाचारी
, इस युग के लंकेश है ॥
कुछ तो बात निराली थी, जो चूम के फन्दे पर झूले ।
जिसे परदादा भी याद नहीं, वो भगतसिंह को ना भूले ॥
… 

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