बुधवार, दिसंबर 07, 2011

जन्म-मरण

बूँद गगन की मेरा बचपन
बूँद धरा की मेरा यौवन
बूँद-ए-सागर हुआ बुढापा
भाप हो जैसे ख़त्म कहानी
फिर से बूँद, नया है जीवन
कैसा पतझड़ कैसा सावन?

सोमवार, अगस्त 15, 2011

हिन्दुस्तानी बस नाम नहीं

हिन्दुस्तानी बस नाम नहीं, इस दिल में हिन्दुस्तान है!
बदनाम नहीं होने देंगे, जब तक इस तन में जान है!

बस हाथ ज़रा से छूटे है, पर एक सभी के प्राण है !
फिर आपस में हाथ पकड़ कर देखो, क़दमों में पाकिस्तान है!

झुकना हमने सीखा ही नहीं, रग-रग में स्वाभिमान है !
नेताजी और आज़ाद शरीखे, लोगों की हम
संतान है !

बम बंदूकों से दुनिया में, कब होता गुण-गान है !
औकात हमारी मत पूछो, दुनियाँ में हमारी शान है!

वो चिंगारी समझ के बैठे है, जो ज्वाला का मगर निशान है!
मुझे एक अकेला मत समझो, हर दिल में ये तूफ़ान है!

वो मूढ़ जिसे मृत्यु कहते, वो बूँद का सागर होना है !
हम बाद शहादत ज़िंदा रहते, भारत माँ का वरदान है!

सच्चाई सीखी हरिश्चंद्र से, और भीम से छाती पाई है!
चट्टानों से इंसान यहाँ, फौलादों सा ईमान है
WRITTEN BY MANOJ HINDUSTANI

गुरुवार, जुलाई 14, 2011

mumbai attack



'' श्री ''
कैसे चीत्कारें उठती है.मायानगरी की मीनारों से
तुम कैसे नजर मिलाओगे,उन रक्त की लाल फुहारों से

तुम अमन की आस में बैठे हो वो खेल गए अंगारों से
आम आदमी राम भरोसे,तुम घिरे हो पहरेदारों से

कभी फुर्सत में तुम जंग जीतना धरती,चाँद सितारों से
तेम सवा अरब हो शूरवीर हो फिर क्यों डरते हो हजारों से

मत काम चलाओ भाषण से,बहलाओ नहीं विचारों से
तुम हाथ काट दो उस के जो हुंकार भरे हथियारों से

लाचार बना दो उसको जो, है खेल रहे लाचारों से
दुनियाँ को दिखलादो की कैसे बात करे गद्दारों से

कुछ सबक उन्हें भी सिखला दो जो मिले है इन मक्कारों से
अब अंधियारों को मात मिले पूरब वाले उजियारों से
… 

मंगलवार, मार्च 01, 2011

क्या से क्या हो गई


बड़ा भयंकर सपना देखा, जैसे रूह से जान निकल गयी।
दानवता ने गढ जीते है, मानवता कोने में सो गयी ॥
रिश्ते नाते भूल गए सब, नसीहतें अपमान सी हो गयी।
मेरी दोनो आँखे भी अब, आपस में अनजान सी हो गयी॥
भूल गए आँगन चौबारे, दूर से दीखते पिंजरे सारे।
जो धन्ना सेठ की कोठी थी, वो धन्ने के मकान सी हो गयी॥
हम जीते जागते डैड हो गए, कुछ दादा-दादी मैड हो गए।
जिंदगी ने पढ ी किताबे तो कितनी नादान सी हो गयी॥
अब राम रहीम में दूरी हो गयी, प्यार जहां था छूरी हो गयी।
कल जो सिंवैया ईद की थी, वो अब अब माह-ए-रमजान सी हो गयी॥
बे-ईमानी कहलाती थी, जो कल तक इस दुनियां में।
आज यहाँ पूजी जाती है, कितनों के ईमान सी हो गयी॥
शान रही थी रूप को ढ कना, कल तक की मर्यादा में।
अब तो शान उसी की है, जो लाख दिलों में जान सी हो गयी॥
जो माथे तिलक लगाते थे, नीयम से सर मुंडवाते थे।
अब जींस पहनते पंडित जी, टोपी चश्मा पहचान सी हो गयी॥
कृष्ण सुदामा के रिश्ते, कैसे उनसे नीभ जाते थे।
अब धन वालो से यारी रखना, कैसे अब वरदान सी हो गयी॥
नए नवेले सपनें है, यहाँ बेगाने से अपने है।
स्वप्न-लोक में भीड भरी है, सच्चाई सुनसान सी हो गयी॥
… 

आखर सदा ही लाख रा


आखर
ऐ आखर सदा ही लाख रा, कोरा कागद खाक रा।
आखर बचसी साख रा, कागद ढ़िगलाराख रा॥
लिखणे वाळा तो पीपल रे पत्ता पर भी लिखग्या।
बिण कागद रा आखर भी हीरा-मोत्यांमें बिकग्या।
इण आखर रा मंत्रा सूं तो भूत भी भागे।
बिन आखर रा कागद सूं तो बस लांपो लागे॥
म्हारा आखर सूं कागद री कीमत भी बढ जावेला।
और आखर खातिर ही तो कोई घर में कागद लावेला॥
एक एक आखर सूं तो बिगड ा काम बणे।
एक आखर में रम सूं देखो राम बणे॥
आखर सूं ही लोग किताबां छापेला।
बिण आखर तो दुनिया गोबर थापेला॥
जूना आखर चट्‌टानां में घर करग्या।
काल रा कागद आज लिफाफा में सरग्या॥
आखर सीखण रा तो लाखों रूपिया लागेला।
और कागद वालो किलो रा ढ ाई मांगेला॥
जिण आखर सूं ज्ञान मिले, उण आखर ने सम्मान मिले।
जब जब भी आखर पूजीज्या, तब कागद न अभिमान मिले॥
मैं जाणूं हूं सगली बातां, मत समझों सिक्को खोटो हूं।
मै एक सिपाही आखर रों, हालांकि सबसूं छोटो हूं॥
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कुछ तो बात निराली थी


स्वार्थ भाव सोचे बिना, वो लड़ते रहे जूनून से ।
अपने हवाले कर गये बगिया, जो सींची अपने खून से ॥
राजगुरू सुखदेव भगतसिंह, इन सबका घर परिवार था ।
हम मिट जाये वतन ना मिटे, उनका मगर विचार था ॥
प्रेम प्यार परिवार में रहना उनका भी अधिकार था ।
प्राण को खोकर भी सुख पाना, लेकिन सच्चा सार था ॥
मान देश का बड ा है, अपनी जान की कीमत सस्ती है ।
हर दानी छोटा लगता है, ऐसी उनकी हस्ती है ॥
भूख से कितने दिन लड कर, भी कभी नही मजबूर हुऐ ।
तब आतंकी भी कहलाए, जो देश के कोहिनूर हुए ॥
जाते जाते वन्दे मातरम्‌, का जिसने जयघोष किया ।
ब्रिटिश फौज को बिन हथियारों, के मानो बेहोश किया ॥
आज फिजाओं में गूंजा दो, जो उनका सन्देश है ।
अन्यायी और भ्रष्टाचारी
, इस युग के लंकेश है ॥
कुछ तो बात निराली थी, जो चूम के फन्दे पर झूले ।
जिसे परदादा भी याद नहीं, वो भगतसिंह को ना भूले ॥
… 

devee ree andekhee

नारी री कोख सूं जन्म लियो, और देवी नं अे ध्यावें है।
ई बात सूं पण डरियोड़ा है, कि कन्या घर में आवें है॥
जिण नें लिछमी बतळावें है, हर पल जिणरां गुण गावें है।
बा खुद ही घर में आती हुवे तो झट तलवार चलावे है॥
ऐ धन खातर ही लिछमी पूजे, और शक्ति खातर दुर्गा।
पण बेटी बणकर देवी आवे तो वादे सूं फुरगा॥
जोरू री तो आस करे, बिमें अे नखरा खास करे।
दुनिया देखी है ऐ बाता के जळा के जोरू लाश करे॥
ऐ देव बराबर मांगे इज्जत, खुद गली गली मैं रास करे।
नारी तो जग में देवी है, जो कैसा कैसा उपवास करे ॥
भारत माता ने बेच्या बे, भूखड ल्या भूप पुजीजे है।
ममता री भूख रही कोनी, मिस इंडिया रा रूप पूजीजै है॥
सातूं सुख घर में आसी और लाखू दुखड रैसी कोनी।
जद हिन्दुस्तानी यूँ केवला, बेट्‌याँ सू धन बेसी कोनी॥
written & copy-right by MANOJ HINDUSTANI

araz



आज सूणी हूं, नेताजी मिलणे आवेगा
जनता न वे खूब दिया, जो अब पावेगा॥
राशन री लाईन सूं ले आंखया री लाली।
सब देवांला, जनता तैयारी ने चाली॥
ओ खूब हुयो, अब हाल नहीं राखयोआछो।
म्हें शेर बणाया, स्वान बणास्यां अब पाछो॥
मिनखां ने तो ऐ वोट गिणे, खुद कुर्सी नीचे नोट गिणे।
जनता ने ढांढा समझे है, खुद में ना कोई खोट गिणे॥
एै चौराया चमकावण ने, लोगां रा घर तुड़वावे है।
अर खुद लोगां सूं माल पटा, खुद री कोठ्‌या चिणवावे है॥
रे जनता पर हंसणे वाळा, जनता कोई जोकर कोनी।
अब कुर्सी बां ने नही मिले, जो जनता रा नौकर कोनी॥
थे सरकारां की सैण करी, ऐ म्हारी बातां सैण करो।
रामराज आवेला पाछो, म्हासूं इतनो बेण करों॥
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बातें राजस्थान की


किसी कला की कमी नहीं, ना कमी है स्वाभिमान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥

वीरों के पौरूष में भी यहां ईश्वर का वरदान है ।
दानव के आगे नही झुकते, मानव का सम्मान है ॥
पन्ना धाय के त्याग को देखो, भूख नही धन धान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

अमरसिंह के अटल इरादे, महाराणा के तेवर हो ।
जहां चेतक जैसी स्वामी भक्ति, घुंघट जैसा झेवर हो ॥
जहां मीरां की पावनता से विष, बने औषधि प्राण की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

महल, हवेली, किले झरोखें कितनी कलायें लाया है ।
इस भूमि का पत्थर लगकर, ताजमहल बन पाया है ॥
याद रहेगी सबको ये, सौगाते राजस्थान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

एल. एन. मित्तल, प्रतिभा पाटिल, भैरोसिंह से नाम हुए ।
तारकीन और खवाजाजी, यहां सुफी के सम्मान हुए ॥
यहां पे आदर रामायण का, इज्जत यहां कुरान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

कालबेलिया, माड गायकी, कठपुतली के खेल है ।
सब का सबसे नाता है, यहां सबका सबसे मेल है ॥
चेहरे पर है भोलापन, और मूंछे बड़ी है मान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

यहां मौसम बड े निराले है, यहां मेले बड े सुहाते है ।
पुष्कर में गर्मी में भी गौरे सैलानी आते है ॥
आबू की ठंडक से देखें शामें राजस्थान की ।
और जैसलमेर के द्योरो में हो रातें राजस्थान की ॥
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

गणगोरों के मेले है, यहां हर महीने त्योंहार है ।
है सम्मान बुजुर्गो का यहां सामूहिक परिवार है ॥
और बुश, क्लिटंन, ओबामा से, मुलाकातें राजस्थान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

सब है एक समान, वो चाहे राजा है या फकीर है ।
हिन्दु मुस्लिम दोनो पूजे, वो रामदेवसा पीर है ॥
सोने जैसी मिट्‌टी है, सुहानी राजस्थान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

चुनरी वाली साड़ी में तो लगती दुल्हन जानकी ।
यहां की नारी चुनरी को ही अपना जेवर मानती ॥
और चुनरी वाले साफों में बारातें राजस्थान की ।
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........

यह सब पिछले युग की बातें अब तो अपनी बारी है ।
इस भूमि की शान बढाना, अपनी जिम्मेदारी है ॥
पिछले युग के शूरों ने तो, सदा ही बाजी मारी है ।
मरूभूमि के वीर सपूतों, अब की क्या तैयारी है ॥

मेरे भाई बन्धु सुनलो, मुझ छोटे इन्सान की ।
कभी ना आये वो दिन, हो बदनामी राजस्थान की ॥
इसीलिये सब करते रहते बातें राजस्थान की ॥ किसी कला ........
…