आखर
ऐ आखर सदा ही लाख रा, कोरा कागद खाक रा।
आखर बचसी साख रा, कागद ढ़िगलाराख रा॥
लिखणे वाळा तो पीपल रे पत्ता पर भी लिखग्या।
बिण कागद रा आखर भी हीरा-मोत्यांमें बिकग्या।
इण आखर रा मंत्रा सूं तो भूत भी भागे।
बिन आखर रा कागद सूं तो बस लांपो लागे॥
म्हारा आखर सूं कागद री कीमत भी बढ जावेला।
और आखर खातिर ही तो कोई घर में कागद लावेला॥
एक एक आखर सूं तो बिगड ा काम बणे।
एक आखर में रम सूं देखो राम बणे॥
आखर सूं ही लोग किताबां छापेला।
बिण आखर तो दुनिया गोबर थापेला॥
जूना आखर चट्टानां में घर करग्या।
काल रा कागद आज लिफाफा में सरग्या॥
आखर सीखण रा तो लाखों रूपिया लागेला।
और कागद वालो किलो रा ढ ाई मांगेला॥
जिण आखर सूं ज्ञान मिले, उण आखर ने सम्मान मिले।
जब जब भी आखर पूजीज्या, तब कागद न अभिमान मिले॥
मैं जाणूं हूं सगली बातां, मत समझों सिक्को खोटो हूं।
मै एक सिपाही आखर रों, हालांकि सबसूं छोटो हूं॥
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