था रूप जिन्दगी में,था रंग जिन्दगी में!
अब जिन्दगी में यारों,वो बात नहीं है!!
अंधियारे रास्ते है ,घबरा रहा हूं कुछ मैं!
कल कल तक जो साथ में था, वो साथ नहीं है!!
आँखें भी यार मेरी,लगता है थक गयी है !
वो ,रात लग रही, है, जो रात नहीं ,,है!!
पाती भी दे चुका हूं,दर भी खुला है मेरा!
होनी जरूर थी जो, मुलाकात नहीं है!!
मुस्कान मिल रही थी,दीदार से भी जिनके!
किस्मत में यार वो भी, सौगात नहीं है!!
क्या है गलत सही क्या,अब कौन ये बताये!
सर पे जो मेरे कल था, वो हाथ नहीं है!!
सपने निगाह में थे,मुट्ठी में थे सितारे!
सब कुछ बदल गया है,वो हालात नहीं है!!
written by MANOJ HINDUSTANI
सोमवार, जनवरी 09, 2012
बुधवार, दिसंबर 07, 2011
जन्म-मरण
बूँद गगन की मेरा बचपन
बूँद धरा की मेरा यौवन
बूँद-ए-सागर हुआ बुढापा
भाप हो जैसे ख़त्म कहानी
फिर से बूँद, नया है जीवन
कैसा पतझड़ कैसा सावन?
बूँद धरा की मेरा यौवन
बूँद-ए-सागर हुआ बुढापा
भाप हो जैसे ख़त्म कहानी
फिर से बूँद, नया है जीवन
कैसा पतझड़ कैसा सावन?
सोमवार, अगस्त 15, 2011
हिन्दुस्तानी बस नाम नहीं
हिन्दुस्तानी बस नाम नहीं, इस दिल में हिन्दुस्तान है!
बदनाम नहीं होने देंगे, जब तक इस तन में जान है!
बस हाथ ज़रा से छूटे है, पर एक सभी के प्राण है !
फिर आपस में हाथ पकड़ कर देखो, क़दमों में पाकिस्तान है!
झुकना हमने सीखा ही नहीं, रग-रग में स्वाभिमान है !
नेताजी और आज़ाद शरीखे, लोगों की हम संतान है !
बम बंदूकों से दुनिया में, कब होता गुण-गान है !
औकात हमारी मत पूछो, दुनियाँ में हमारी शान है!
वो चिंगारी समझ के बैठे है, जो ज्वाला का मगर निशान है!
मुझे एक अकेला मत समझो, हर दिल में ये तूफ़ान है!
वो मूढ़ जिसे मृत्यु कहते, वो बूँद का सागर होना है !
हम बाद शहादत ज़िंदा रहते, भारत माँ का वरदान है!
सच्चाई सीखी हरिश्चंद्र से, और भीम से छाती पाई है!
चट्टानों से इंसान यहाँ, फौलादों सा ईमान है
WRITTEN BY MANOJ HINDUSTANI
बदनाम नहीं होने देंगे, जब तक इस तन में जान है!
बस हाथ ज़रा से छूटे है, पर एक सभी के प्राण है !
फिर आपस में हाथ पकड़ कर देखो, क़दमों में पाकिस्तान है!
झुकना हमने सीखा ही नहीं, रग-रग में स्वाभिमान है !
नेताजी और आज़ाद शरीखे, लोगों की हम संतान है !
बम बंदूकों से दुनिया में, कब होता गुण-गान है !
औकात हमारी मत पूछो, दुनियाँ में हमारी शान है!
वो चिंगारी समझ के बैठे है, जो ज्वाला का मगर निशान है!
मुझे एक अकेला मत समझो, हर दिल में ये तूफ़ान है!
वो मूढ़ जिसे मृत्यु कहते, वो बूँद का सागर होना है !
हम बाद शहादत ज़िंदा रहते, भारत माँ का वरदान है!
सच्चाई सीखी हरिश्चंद्र से, और भीम से छाती पाई है!
चट्टानों से इंसान यहाँ, फौलादों सा ईमान है
WRITTEN BY MANOJ HINDUSTANI
रविवार, जुलाई 17, 2011
गुरुवार, जुलाई 14, 2011
mumbai attack
'' श्री ''
कैसे चीत्कारें उठती है.मायानगरी की मीनारों से
तुम कैसे नजर मिलाओगे,उन रक्त की लाल फुहारों से
तुम अमन की आस में बैठे हो वो खेल गए अंगारों से
आम आदमी राम भरोसे,तुम घिरे हो पहरेदारों से
कभी फुर्सत में तुम जंग जीतना धरती,चाँद सितारों से
तेम सवा अरब हो शूरवीर हो फिर क्यों डरते हो हजारों से
मत काम चलाओ भाषण से,बहलाओ नहीं विचारों से
तुम हाथ काट दो उस के जो हुंकार भरे हथियारों से
लाचार बना दो उसको जो, है खेल रहे लाचारों से
दुनियाँ को दिखलादो की कैसे बात करे गद्दारों से
कुछ सबक उन्हें भी सिखला दो जो मिले है इन मक्कारों से
अब अंधियारों को मात मिले पूरब वाले उजियारों से
…
मंगलवार, मार्च 01, 2011
क्या से क्या हो गई
बड़ा भयंकर सपना देखा, जैसे रूह से जान निकल गयी।
दानवता ने गढ जीते है, मानवता कोने में सो गयी ॥
रिश्ते नाते भूल गए सब, नसीहतें अपमान सी हो गयी।
मेरी दोनो आँखे भी अब, आपस में अनजान सी हो गयी॥
भूल गए आँगन चौबारे, दूर से दीखते पिंजरे सारे।
जो धन्ना सेठ की कोठी थी, वो धन्ने के मकान सी हो गयी॥
हम जीते जागते डैड हो गए, कुछ दादा-दादी मैड हो गए।
जिंदगी ने पढ ी किताबे तो कितनी नादान सी हो गयी॥
अब राम रहीम में दूरी हो गयी, प्यार जहां था छूरी हो गयी।
कल जो सिंवैया ईद की थी, वो अब अब माह-ए-रमजान सी हो गयी॥
बे-ईमानी कहलाती थी, जो कल तक इस दुनियां में।
आज यहाँ पूजी जाती है, कितनों के ईमान सी हो गयी॥
शान रही थी रूप को ढ कना, कल तक की मर्यादा में।
अब तो शान उसी की है, जो लाख दिलों में जान सी हो गयी॥
जो माथे तिलक लगाते थे, नीयम से सर मुंडवाते थे।
अब जींस पहनते पंडित जी, टोपी चश्मा पहचान सी हो गयी॥
कृष्ण सुदामा के रिश्ते, कैसे उनसे नीभ जाते थे।
अब धन वालो से यारी रखना, कैसे अब वरदान सी हो गयी॥
नए नवेले सपनें है, यहाँ बेगाने से अपने है।
स्वप्न-लोक में भीड भरी है, सच्चाई सुनसान सी हो गयी॥
…
आखर सदा ही लाख रा
आखर
ऐ आखर सदा ही लाख रा, कोरा कागद खाक रा।
आखर बचसी साख रा, कागद ढ़िगलाराख रा॥
लिखणे वाळा तो पीपल रे पत्ता पर भी लिखग्या।
बिण कागद रा आखर भी हीरा-मोत्यांमें बिकग्या।
इण आखर रा मंत्रा सूं तो भूत भी भागे।
बिन आखर रा कागद सूं तो बस लांपो लागे॥
म्हारा आखर सूं कागद री कीमत भी बढ जावेला।
और आखर खातिर ही तो कोई घर में कागद लावेला॥
एक एक आखर सूं तो बिगड ा काम बणे।
एक आखर में रम सूं देखो राम बणे॥
आखर सूं ही लोग किताबां छापेला।
बिण आखर तो दुनिया गोबर थापेला॥
जूना आखर चट्टानां में घर करग्या।
काल रा कागद आज लिफाफा में सरग्या॥
आखर सीखण रा तो लाखों रूपिया लागेला।
और कागद वालो किलो रा ढ ाई मांगेला॥
जिण आखर सूं ज्ञान मिले, उण आखर ने सम्मान मिले।
जब जब भी आखर पूजीज्या, तब कागद न अभिमान मिले॥
मैं जाणूं हूं सगली बातां, मत समझों सिक्को खोटो हूं।
मै एक सिपाही आखर रों, हालांकि सबसूं छोटो हूं॥
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