'' श्री ''
कैसे चीत्कारें उठती है.मायानगरी की मीनारों से
तुम कैसे नजर मिलाओगे,उन रक्त की लाल फुहारों से
तुम अमन की आस में बैठे हो वो खेल गए अंगारों से
आम आदमी राम भरोसे,तुम घिरे हो पहरेदारों से
कभी फुर्सत में तुम जंग जीतना धरती,चाँद सितारों से
तेम सवा अरब हो शूरवीर हो फिर क्यों डरते हो हजारों से
मत काम चलाओ भाषण से,बहलाओ नहीं विचारों से
तुम हाथ काट दो उस के जो हुंकार भरे हथियारों से
लाचार बना दो उसको जो, है खेल रहे लाचारों से
दुनियाँ को दिखलादो की कैसे बात करे गद्दारों से
कुछ सबक उन्हें भी सिखला दो जो मिले है इन मक्कारों से
अब अंधियारों को मात मिले पूरब वाले उजियारों से
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